शांति बाहर नहीं, ध्यान और आत्मज्ञान से भीतर पैदा होती है
एक साधु ने नदी किनारे एक पत्थर उठाया।
कहा — “यह पत्थर सालों से पानी में है, फिर भी अंदर सूखा है।”
“वैसे ही हम भी दुनिया में हैं, पर भीतर शांति नहीं।”
फिर पत्थर तोड़ा — अंदर सूखा था।
संत बोले — “जब तक ध्यान नहीं करोगे, भीतर पानी नहीं जाएगा।”
बाहर की पूजा तभी असर करती है,
जब भीतर की शुद्धि शुरू होती है।
भारतीय दर्शन यही कहता है — भक्ति बाहर नहीं, भीतर होती है।
शांति मंदिर में नहीं, मन में है।
और मन तब शांत होता है जब तुम अपेक्षा छोड़ देते हो।
जो खुद को जीत लेता है, वही ईश्वर को पा लेता है।